10/15/2012

        
                    ज़ख्म, दवा, मरहम, वजह...
              कौन कहता है कि ये नहीं होती दुआ...
          क्योंकि न होता ज़ख्म, और न बनती दवा...


न लगता लगता मरहम और न होती किसी के दुआ करने की वजह...

                ज़ख्म, दवा, मरहम, वजह...
            कौन कहता है कि ये नहीं होती दुआ...

  तेरे अल्फ़ाज़ और वो तेरी ख़ामोशी...
पढ़ी है मैंने, तेरी हिरनी सी आंखें में
                    और
उनमें काजल की वो बारीक सी स्याही से

  पढ़ी है मैंने,तेरे लवो की वो ख़मोशी...
   तेरे चेहरे का नूर है , तेरी मुस्कराहट...
                     क्योंकि
  तेरे अल्फ़ाज़ और वो तेरी ख़ामोशी...
   पढ़ी है मैंने, तेरी हिरनी सी आंखें में

10/14/2012


ये कौन सी डगर है...ये कैसा भंवर है...

    मंजिल पे पहुंचकर भी

क्यों लगता है, कि अधूरा सफर है...!!! 

मौन है अजीब सा...मंथन है मन में उमड़ पड़ा...

     तमाशबीन है क्यों ज़िंदगी...

क्यों राहों पर पहुंचकर भी...भटकता है ये मन भला

  ये कैसा है मुकद्दर..यै कैसा है ज़िंदगी का भला...!!!


   वक्त के हाथों हर पल क्यों गया हूं मैं छला...!
 

        ये कौन सी डगर है...ये कैसा भंवर है...

            मंजिल पे पहुंचकर भी

      क्यों लगता है, कि अधूरा सफर है...!!!

    मैं इक जिंद्द हूं...तू भी एक ज़िद्द है...

 

    तुझे-- पाने की चाहत है मुझे...

           और

   तुझे-- खोने की ज़िद्द है मुझे

 

     कैसी अजब ज़िद्द है ये...

 

मेरा जुनून ज़िद्द है...तेरा सुकून ज़िद्द है...

 

       मेरा वजूद ज़िद्द है

    तेरा यकीन ज़िद्द है

 

तेरी ख्वाहिशें ज़िद्द हैं...मेरी हकीकत ज़िद्द है... 

     

हर ज़ख्म सह लेने की आदत है अब मुझे...
पीछे से वार सह लेने की आदत है मुझे...

आस्तीन के सांप पाले हैं ना जाने कितने...
तभी तो हर ज़हर पी लेने की आदत है मुझे...!!!

ज़हर-पी-पीकर मैं बन गया हूं विष का समंदर...
तभी तो ख़तरों से खेलने की आदत है मुझे...!!!

हर ज़ख्म सह लेने की आदत है अब मुझे...
पीछे से वार सह लेने की आदत है मुझे...