6/23/2014

        
    तन्हाइयां...

   
तन्हाइयों में तेरे बिन खुद को इतना अकेला पाता हूं मैं

         जैसे बिन धागे की कटी पतंग...

तन्हाइयों में तेरे बिन खुद को इतना अकेला पाता हूं मैं

        जैसे बिन पानी के प्यासा सावन...

तन्हाइयों में तेरे बिन खुद को इतना अकेला पाता हूं मैं

       जैसे बिन पानी के तड़पती मछली

तन्हाइयों में तेरे बिन खुद को इतना अकेला पाता हूं मैं

      जैसे समंदर की गहराईयों में मोती सीप का

तन्हाइयों में तेरे बिन खुद को इतना अकेला पाता हूं मैं

      जैसे बिन श्वासों के धरा पर रखा मानव शरीर

           कैसे बताऊं...कैसे समझांऊ...

     कि मैं पतझड़ हूं तेरा और तू है मेरा बसंत

     मैं बादल हूं तेरा और तू है सावन मेरा

        रूह के अंदर बस तू-ही-तू है

     फिर भी चंचल मन है कि ढूंढता है तुझे

     कैसे समझाऊं मैं इस चंचल मन को

       कि तू दूर नहीं दिल के पास ही है            

     मेरे मन के कोने-कोने में बस तू-ही-तू है

         कैसे बताऊं...कैसे समझांऊ...

     कि मैं पतझड़ हूं तेरा और तू है मेरा बसंत

     मैं बादल हूं तेरा और तू है सावन मेरा

        रूह के अंदर बस तू-ही-तू है

 
ज़िदगी में गम भी हैं और खुशियां भी हैं...
आँखों में नमी भी है और सुर्खियां भी हैं...
दोस्तों ये दुनिया है...
 
बस समझने और देखने वाले की नज़रों की ये बारीकियां हैं..
गम को गले लगाकर खुशियां मना लो तुम...
नमी को अश्कों से हटाकर एक रौशनी जगा दो तुम...
 
किसी के टूटे हुये दिल को अपनी मुस्कराहटों से जगमगा दो तुम...
किसी की दुआएं लेकर ज़िदगी बना लो तुम...
ये दुनिया है...
बस समझने और देखने वाले की नज़रों की ये बारीकियां हैं...
 
 

 

6/22/2014

इक नई जंग

हर दिन इक नई जंग...एक नई उड़ान है
अकेले हूं ये पता है मुझे
तभी तो तूफानों से प्यार है...


वक्त बदला था , सोंचा था मैंने...
अब साथ चलेंगे मिलकर
लेकिन क्या पता था...कि
वक्त के हाथों फिर से मात खा जाऊंगा...


यकीं है खुद पर,
भले ही मुझ पर कोई एतवार न करे
हर वार का दूंगा जबाव
चाहें कोई छुपकर ही मुझपर वार क्यों न करे


नहीं है मुझमें समझ ऐसा लोग सोंचते हैं
माया का नहीं है मोह फिर भी लोग टोंकते हैं
घमंड नहीं खुद पर मुझे नाज़ है
तुझे हो न हो लेकिन मुझे खुद पर एतवार है...


हर दिन इक नई जंग...एक नई उड़ान है
अकेले हूं ये पता है मुझे
तभी तो तूफानों से प्यार है...

12/24/2013

कैसे भूल जाऊं तुम्हें...


कि हां मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूं
और
कैसे भूल जाऊं कि मैं ही तुम्हारा गुनहगार हूं...!!!

तुम्हारी खुशी को ख़ामोशी में बदलने का...
अनजाने ही सही लेकिन
तुम्हारे दिल के अरमानों को तोड़ने का

और उससे भी कहीं ज़्यादा,
तुम्हारे भरोसे को ठेस पहुंचाने का...  

कैसे भूल जाऊं तुम्हें...कि
हां सच में तुम्हारा गुनहगार हूं...!!!

हां मैं मानता हूं कि मैंने तुम्हारा दिल दुखाया...
लेकिन शायद तुम्हें ये आभास भी नहीं...
कि उसके बाद एक पल सुकून से मैं भी तो नहीं जी पाया...

बरसों बाद तुम्हीं थीं वो
जिसने मन में एक आस पैदा की...
जीने की ... उड़ने की और ख्बाव बुनने की ...

कैसे भूल जाऊं तुम्हें...
कि हां मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूं...!!!

कैसे ज़हन से निकाल दूं...
ज़िंदगी के वो ख़ूबसूरत दो दिन

जब तुमने आंख मूंदकर
मुझ पर भरोसा कर मुझमें...
ज़िंदगी जीने की मन में हसरत पैदा कर दी
दिल की हर बात कहने की इक आज़ादी दी

कैसे भूल जाऊं मैं...कि
हां मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूं...!!!

बात किसी और की होती तो शायद
मैं इतना न तड़पता...
तुमने बुझे हुए दीपक को फिर से इक रौशनी दी...

कैसे मैं फिर से बुझकर
तुम्हारे चेहरे की उदासी का कारण बन जाऊं...

बताओ
कैसे मैं तुमसे, तुम्हें जुदा कर जाऊं...

बताओ
कैसे मैं बरसों बाद तुम्हारे चेहरे पर आई
खिलखिलाहट को भूल जाऊं...

बताओ
कैसे मैं तुम्हारे विश्वास को वापस लाऊं...

तुम्हीं बताओ
मैं कैसे अनजाने में हुए अपने उस गुनाह से
तुमको मुक्त कर पाऊं...

कैसे भूल जाऊं तुम्हें...
कि हां मैं ही तुम्हारा गुनहगार हूं...!!!

हो सके तो मेरी उस नादानी को भुला देना 
इक बच्चे की शरारत समझकर 
फिर से मुस्करा देना ...

क्योंकि

कैसे भूल जाऊं तुम्हें
कि हां मैं तुम्हारा दिल से शुक्रगुज़ार हूं...!!!



   

 
     

  

5/10/2013


      "मनप्रिय"  
   जो 'मन को हो प्रिय' उसे कह दो होकर अभय
   न कहना फिर खुद-से कि निकल गया समय

वक्त न कभी किसी का था, ना कोई हो सका वक्त का
       कहीं कोई जो हो गर 'मन को प्रिय'
    वक्त गुज़रने से पहले तुम बोल देना ह्रदय...!!!

    मन में रखने से अच्छा है खोल देना ह्रदय
       तुम न घुटना मन ही मन फिर
      न फिर करना कोई शिकवा ए-ह्रदय...!!!

   उड़ चलेगा बादल-हवा के झोंकों से हिलकर
   फिर गगन होगा नीला जो होता है अक्सर
   सावन के पतझड़ बनकर रहना से अच्छा है
           बसंत ऋतु बनना
   नई उमंगे-नये मौसम में खुद को तुम रंगों से भर लेना

       बस ऐसे ही हो जाना तुम अभय...
        उस 'मनप्रिय' के लिए भी  
  जो 'मन को हो प्रिय' उसे कह दो होकर अभय...!!!